रोजमर्रा – In Night & Pen With #SK

मैं किसी पंक्ति में खरा कुछ वार्तालाप सुनता जा रहा था; रोज में सुबह जा भीड़ में खो जाता, पढ़ने की कोशिश करता कुछ देर के वक्त में अनेकों अजनबी …

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ये भागती जिंदगी कहाँ ले जाती ?

फसल सी हिलती डुलती भीड़, सड़कों पर हो आती .. ये पुरानी खेतें .. एक जिंदा शहर बन जाती ! कितनी तंग गलियों से गुजरते गुजरते, दूर जा के ये …

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दो कदम चल टूट जाता ..

ये सब्र ही है है जो दो कदम चल टूट जाता; पूछता नहीं तुमसे क्या साजिशे किसकी ! हर रिश्ता कैसा जाना अनजाना छुट जाता; सोचता नहीं अब क्या दोहमते …

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एक छोटी सी ख्वाबों की कहानी – Story By SK

ऐसे ख्वाब का क्या भरोसा, नींद में क्या आते जाते टूटते रहते ! ऐसी ही एक नींद भरी रात थी, आज किन यादों को नींद को लेके नींद आयी थी …

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