चल दौड़ लगाये एक बार फिर, कहाँ गया तेरा हौसला ??
अनजाने में खुद ही खीच ली उम्मीदों की रेखा, अब पार जाना आसान सा नही हो रहा, खुद ही पंख पसारे उड़े थे इन आसमां में कभी, आज सहमे से …
चल दौड़ लगाये एक बार फिर, कहाँ गया तेरा हौसला ?? Read MoreThe Life Writer & Insane Poet
अनजाने में खुद ही खीच ली उम्मीदों की रेखा, अब पार जाना आसान सा नही हो रहा, खुद ही पंख पसारे उड़े थे इन आसमां में कभी, आज सहमे से …
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पतझरों से उजरे उजरे दिन लगते , दुपहरी है अब लगती विकल सी ! वैसाख के इस रूखे दिन तले, कभी बचपन में सोचा करते थे ! और चुपके आहिस्ता …
वैसाखी दुपहरी ! Read More
खामोश ही सही, पर रहों आसपास बनकर ! बिखर जाओ भले, रह जाओ एक अहसास बनकर ! दूर जाने से किसे कौन रोके, ठहर जाओ बस कुछ याद बनकर ! …
बैठे हो क्यों ख्वाब बन कर ? Read More
“आज जन्मदिवस पर कुछ भाव अनायास मन में उठे ! इस कविता का संदर्भ : मैं गंगा किनारे बसे अंग प्रदेश से हूँ .. और अभी यमुना नदी के शहर …
अंग प्रदेश की भागीरथी Read More
सृजन के शब्दों को सहारे नहीं मिलते ! वक्त की आपा धापी को सिरहाने नहीं मिलते ! कोशिश जब की ख्वाबो को चुराने की, रातों को नींद के बहाने नही …
वक्त की आपा धापी को सिरहाने नहीं मिलते ! Read More
है दंभ अब किन बातों का ! आंखे फाड़े काली रातों का ! विकट जो चुप्पी छाती है, और तभी सुनामी आती है ! बौने से जो अब पेड़ खड़े, …
और तभी सुनामी आती है ! Read More