निर्वात पथ पर ….
निर्वात पथ पर अब संवाद नहीं ; व्यर्थ वक़्त का तिरस्कार नहीं ! शून्य सफर पर अब श्रृंगार ही क्या ? विचलित पथ का उपहास ही क्या ? मौन पड़े …
निर्वात पथ पर …. Read MoreThe Life Writer & Insane Poet
निर्वात पथ पर अब संवाद नहीं ; व्यर्थ वक़्त का तिरस्कार नहीं ! शून्य सफर पर अब श्रृंगार ही क्या ? विचलित पथ का उपहास ही क्या ? मौन पड़े …
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कार्यस्थल भी एक परिवार है ! हम अपने जिंदगी में कितना वक़्त कार्यस्थल पर व्यतीत करते ; मेट्रो शहर में एक ही तो धुन होती सुबह उठ के कार्यस्थल की …
A Thank You Note !! Read More
ये पुरवा हवा.. काश इसे कैनवास पर उतारा जा सकता; शब्दों में बांधा जा सकता; या किसी संगीत में इसे समाया जा सकता; अपने संवेग से अल्हड़ बन ये बहता …
ये पुरवा हवा.. Read More
खेती व्यवसाय नहीं है ; कैसे होगा मिट्टी वाला पैर से उ लक्ज़री पॉलिश वाला मार्बल खराब नहीं हो जायेगा ! ” भारत एक कृषि प्रधान देश है ” ; …
प्राइम टाइम – खेत खलिहान से (व्यंग्य) Read More
थम गये हैं हम और तुम भी ; नहीं थमा ये वक़्त का पहिया ; चलता रहा दुर जाता रहा ; अब सफर के दो दिशाओं में ; मुमकिन न …
थम गये हैं .. Read More
दोपहर पर कितना कुछ है लिखने के लिये ~ कुछ मित्रों ने कहा ये दोपहर इतना उपेक्षित क्यों ; तो एक कविता “दोपहर” पर कोशिश करिये ; एक दोपहर , …
दोपहर Read More