ख्वाबों की भी कोई दुनिया है क्या ?

खामोश जुबाँ से हो जाऊँ अजनबी ; या सब कहके बन जाऊँ मैं गुमशुदा ! मैं अब रोज दुहरा नहीं सकता .. बीती बातों का किस्सा फिर से ! कई …

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मंदिर के सीढियों पर …

बीते रात के ख्वाब को एक दिन, मंदिर के सीढियों पर देखा । माथे पर कुमकुम का टीका, थाल अरहुल थे सब सजे । बीते रात के ख्वाब को, सीढियों …

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खामोशी भी उम्र भर निभायेगें ….

इक जैसे चेहरे कब से, ना भाव भंगिमा कुछ भी, पत्थर की मूरतें हो जैसे, सदियों से वैसे ही अब तक, शिकवे शिकन सजते रहे चेहरों पर, हमें इंसा होने …

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