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हाथों से फिसल से गये …

किसी रोज की दूसरी बारिश थी, बुँदे इस तरह कांचों से फिसल गये, जैसे धुल गये अवसाद कितने पुराने, लिपटते रहे बूंदें कांचों से कितने भी, रिश्ते कच्चे थे हाथों …

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बहुत बड़ा रंगमंच है ये जिंदगी !!

क्या खुद के विश्वास पर भी .. अविश्वास किया जा सकता ! उहापोह है इस प्रश्न पर .. अंतर्द्वंद भी बोझ भी ! बहुत बड़ा रंगमंच है; इस ओर से उस …

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चुनाव सन माइनस २०१४ …

बहुत ही अदभुत मेला लगा है इस रियासत में.. इक राहगीर ने चलते हुए पूछा क्या कोई उत्सव है; भाई पुरे पाँच साल के बाद ये आया है, कहने वाले …

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जिंदगी ऑनलाइन ……

टीवी पर कोई कार्यक्रम ना भी देख पाये कोई बात नहीं .. पर ऑनलाइन नोटीफिकेशन ना मिस हो .. ये ट्विट्रर फेसबुक की दुनिया ! कितना भी कह ले आभाषि …

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